सोमवार, 26 अगस्त 2013

Kundalini Chakra

कुंडलिनी चक्र से हमारा अभिप्राय यह है की जब कुंडलिनी अपने कुंडली को खोलकर उर्ध्वगामी होती  है तो वह कुछ  विशेष स्थानों से होकर मस्तक  की ओर बढती है | यह स्थान सात प्रकार के होते है , यथा - मूलाधार ,स्वाधिष्ठान , मणिपुर , अनाहत , विशुद्ध , आज्ञाचक्र और सहस्रार | ये ही सात चक्र कहलाते है | कुंडलिनी शक्ति मूलाधार के नीचे से उठ कर सहस्रार  तक जाती है और इसी प्रक्रिया को कुंडलिनी जागरण कहते है |

इन चक्रों के शरीर में स्थान निम्न प्रकार से है :-

 १  }        गुदा या योनि  के पास मूलाधार चक्र,
  २ }        पेडू के पास स्वाधिष्ठान चक्र ,
  ३ }        नाभि के पास मणिपुर चक्र ,
  ४ }        हृदय के पास अनाहत चक्र ,
  ५ }        कंठ के पास विशुद्ध चक्र ,
  ६ }         दोनों भोहों के बीच आज्ञाचक्र,
  ७ }         मस्तक के उपरी सिरे पर सहस्रार चक्र  |


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